लखनऊ में उर्दू कैसे फली-फूली: नवाब जाफ़र मीर अब्दुल्ला की ज़ुबानी अवध का इतिहास
अठारहवीं सदी के आख़िर में जब मुग़ल दिल्ली कमज़ोर हो रही थी, उसी समय अवध की राजधानी लखनऊ कला, शायरी और तहज़ीब का नया केंद्र बन रही थी। अप्रैल 2021 में वॉक्सी टॉक्सी की ख़ास सीरीज़ में नवाब जाफ़र मीर अब्दुल्ला ने इसी दौर की कहानी सुनाई।
वीडियो में क्या है
यह वीडियो 2 अप्रैल 2021 को अपलोड हुआ और नवाब जाफ़र मीर अब्दुल्ला के साथ सीरीज़ का एक हिस्सा है। वे बताते हैं कि अवध के चौथे नवाब आसफ़ुद्दौला (शासन 1775 से 1797) ने जब लखनऊ को राजधानी बनाया, तब दिल्ली उजड़ रही थी और वहाँ के कारीगर और फ़नकार सरपरस्ती की तलाश में थे; नवाब ने उन्हें लखनऊ बुलाया। उनके शब्दों में उर्दू दक्षिण में पैदा हुई, दिल्ली में जवान हुई और लखनऊ में निखरी। वे गंगा-जमुनी तहज़ीब, बोलचाल के अदब और नवाब वाजिद अली शाह के प्रति लोगों के लगाव की बात करते हैं, और यह भी कहते हैं कि भाषा की समझ घटने से कई जगहों और शब्दों के नाम बिगड़ गए।
आसफ़ुद्दौला और लखनऊ का उदय
- आसफ़ुद्दौला 1775 में नवाब बने और उसी साल अवध की राजधानी फ़ैज़ाबाद से लखनऊ लाई गई।
- उन्होंने 1784 में बड़ा इमामबाड़ा बनवाया, जो अकाल के समय रोज़गार देने के लिए भी याद किया जाता है।
- उनके दौर में लखनऊ में शायरों, संगीतकारों, कारीगरों और बावर्चियों का जमावड़ा बढ़ा।
शायर जो दिल्ली से लखनऊ आए
उर्दू के बड़े शायर मीर तक़ी मीर 1782 में दिल्ली से लखनऊ आ गए थे और 1810 में यहीं उनका निधन हुआ। दिल्ली के कई और शायर और उस्ताद भी इसी दौर में अवध पहुँचे। धीरे-धीरे लखनऊ की अपनी शायरी की शैली बनी, जिसे 'लखनवी स्कूल' कहा जाता है, और दिल्ली व लखनऊ के अंदाज़ की तुलना उर्दू साहित्य में आज भी होती है।
वाजिद अली शाह और अदब
अवध के आख़िरी नवाब वाजिद अली शाह ने 13 फ़रवरी 1847 से 1856 तक शासन किया। 11 फ़रवरी 1856 को ईस्ट इंडिया कंपनी ने अवध पर क़ब्ज़ा कर लिया और नवाब को कलकत्ता (मटियाबुर्ज) भेज दिया गया, जहाँ 1 सितंबर 1887 को उनका निधन हुआ। संगीत में वे 'अख़्तरपिया' नाम से लिखते थे और ठुमरी 'बाबुल मोरा नैहर छूटो जाय' उन्हीं से जोड़ी जाती है।
आज के लिए सीख
- लखनऊ का 'पहले आप' वाला अदब और नफ़ीस ज़ुबान इसी इतिहास की देन है; इसे समझने के लिए मीर और लखनवी शायरों को पढ़ना अच्छी शुरुआत है।
- शहर की पुरानी इमारतें, जैसे बड़ा इमामबाड़ा, उसी दौर की गवाह हैं; घूमते समय उनके इतिहास को आधिकारिक पर्यटन स्रोतों से भी पढ़ें।
- वीडियो में कही गई कई बातें मौखिक परंपरा और वक्ता की निजी राय पर आधारित हैं।



