अवध की होली का इतिहास: पद्मश्री योगेश प्रवीण ने बताईं नवाबी दौर की परंपराएँ
अवध की होली अपने रंग, गीतों और मेल-जोल के लिए जानी जाती है। मार्च 2021 में होली के मौक़े पर वॉक्सी टॉक्सी ने लखनऊ के इतिहासकार पद्मश्री योगेश प्रवीण से जाना कि नवाबी दौर में यह त्योहार कैसे मनाया जाता था।
वीडियो में क्या है
यह वीडियो 29 मार्च 2021 को, होली के दिन अपलोड हुआ। उस समय कोरोना महामारी का दौर चल रहा था, और प्रस्तोता शुरुआत में इसी का ज़िक्र करते हैं। योगेश प्रवीण बताते हैं कि होली उत्तर भारत का ख़ास पर्व है और रबी की फ़सल से जुड़ा है, इसलिए होलिका में गेहूँ, चना जैसी नई फ़सल की बालियाँ भूनी जाती हैं; साथ ही वे प्रह्लाद की पौराणिक कथा का ज़िक्र करते हैं। वे कहते हैं कि अवध के होली-गीतों में राम और लक्ष्मण भी रंग खेलते दिखाई देते हैं। नवाबी दौर के बारे में वे एक किस्सा सुनाते हैं कि एक नवाब नहा-धोकर कहीं जा रहे थे, चौक में होली चल रही थी तो वे रुके, जनता के साथ रंग खेला, गले मिले और फिर कपड़े बदले। उनके अनुसार नवाब वाजिद अली शाह होली धूमधाम से मनाते थे और उनकी संगीत की किताबों में होली के लोकगीत मिलते हैं।
नवाबी दौर की पृष्ठभूमि
- अवध के नवाब आसफ़ुद्दौला ने 1775 से 1797 तक शासन किया और उन्हीं के समय लखनऊ राजधानी बना।
- आख़िरी नवाब वाजिद अली शाह ने 1847 से 1856 तक शासन किया। वे संगीत, नृत्य और रंगमंच के बड़े संरक्षक थे और 'अख़्तरपिया' नाम से रचनाएँ करते थे।
- अवध के दरबार में हिंदू और मुस्लिम दोनों परंपराओं के त्योहार मनाए जाने के किस्से मशहूर हैं, जिन्हें गंगा-जमुनी तहज़ीब का उदाहरण माना जाता है। इनमें से कई किस्से लोक-स्मृति और परंपरा पर आधारित हैं।
होली, फ़सल और मेल-मिलाप
होली फागुन की पूर्णिमा को होलिका दहन के साथ शुरू होती है और अगले दिन रंग खेला जाता है। गाँवों में होलिका की आग में नई फ़सल की बालियाँ भूनने की परंपरा आज भी है। अवध में फाग और होरी गाने की परंपरा भी पुरानी है। योगेश प्रवीण के शब्दों में इस त्योहार का सबसे बड़ा संदेश है, सबको साथ लेकर चलना और भेदभाव भूलकर गले मिलना।
सुरक्षित होली के लिए सुझाव
- प्राकृतिक या हर्बल रंगों का इस्तेमाल करें; रासायनिक रंग त्वचा और आँखों को नुक़सान पहुँचा सकते हैं।
- पानी बचाएँ और जानवरों पर रंग न डालें।
- जो लोग रंग नहीं खेलना चाहते, उनकी इच्छा का सम्मान करें।
- होलिका दहन में ज़िम्मेदारी से आग जलाएँ और बच्चों को उससे दूर रखें।
योगेश प्रवीण का निधन 12 अप्रैल 2021 को हुआ, यानी यह बातचीत उनकी आख़िरी होली के समय रिकॉर्ड हुई थी।



