Buddhist Stupa : बौद्ध स्तूप के पारम्परिक प्रकार व उनके नाम

Buddhist Stupa: महान सम्राट अशोक ने चौरासी हजार स्तूप अपने साम्राज्यान्तर्गत निर्मित कराए थे जो पूरे भारत सहित सुदूर अफगानिस्तान, चीन, कोरिया तक मिलते हैं।

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सम्राट अशोक के द्वारा चौरासी हजार स्तूप बनवाये गए 

आठ स्तूपों में अवस्थित पावन धातुओं में से सात स्तूपों से अवशेषों को उत्खनित करा कर महान सम्राट अशोक ने चौरासी हजार स्तूप अपने साम्राज्यान्तर्गत निर्मित कराए थे जो पूरे भारत सहित सुदूर अफगानिस्तान, चीन, कोरिया तक मिलते हैं। तथापि स्तूप सिर्फ निर्वाण, परिनिर्वाण या महापरिनिर्वाण के उपरान्त मात्र धातु अवशेषों पर ही नहीं निर्मित होते हैं बल्कि महान घटनाओं के स्मृतिस्वरूप भी भी बनते हैं।

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पारम्परिक रूप से स्तूप आठ प्रकार के होते हैं:-

1. पद्म स्तूप (पदुम छोटेन-Padum Choten), लुम्बिनी

2. बुद्धत्व स्तूप (छांगचुब छोटेन-Changchub Choten), बोधगया

3. धम्मचक्क पवत्तन स्तूप (ताशी गोमांग छोटेन-Tashi Gomang Choten), सारनाथ

4. अष्टप्रतिहार्य स्तूप (चोटुल छोटेन-Chotul Choten), श्रावस्ती

5. देवलोक अवतरण स्तूप (ल्हबाब छोटेन-Lhabab Choten), संकिसा

6. मैत्री स्तूप (इन्दुम छोटेन-Andum Choten), राजगृह

7. विजय स्तूप (नामग्याल छोटेन-Namgyal Choten), कौशाम्बी

8. निब्बान स्तूप (न्यंगदे छोटेन-Nyangday Choten), कुशीनगर

लद्दाखी और तिब्बती बुद्ध धम्म में स्तूपों को निर्मित करने की बड़ी समृद्ध परम्परा है।

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1. पद्म स्तूप

पहली प्रकार का स्तूप ‘पद्म स्तूप’ कहलाता है। पद्म का अर्थ होता है कमल। ऐसा मिथक है कि जब सिद्धार्थ गौतम का जन्म हुआ तो जन्म लेते ही वे सात कदम चले थे और उनके कदमों के नीचे कमल के फूल प्रादुर्भूत हो गये थे। उसी घटना की स्मृति में निर्मित स्तूप को पद्म स्तूप कहते हैं। उसमें कमल के फूलों का अंकन विशिष्ट होता है। लद्दाख की भोट भाषा में उसे पदुम छोटेन(Padum Choten) कहते हैं। भोट भाषा में स्तूप को छोटेन कहते हैं। तिब्बती व लद्दाखी बौद्ध यह स्तूप लुम्बिनी में बनवाते हैं।

2. बुद्धत्व स्तूप

भगवान बोधगया में बोधिवृक्ष की छांव में बुद्धत्व को उपलब्ध हुए। इस घटना की पृष्ठभूमि में ‘बुद्धत्व स्तूप’ निर्मित होता है। यह स्तूप बोधगया में बनाया जाता है। भोट भाषा में इसे छांगचुब छोटेन (Changchub Choten) कहते हैं।

3. धम्मचक्क पवत्तन स्तूप

नाम से ही स्पष्ट है कि यह स्तूप भगवान की पहली देशना, जिसे धम्मचक्क पवत्तन कहते हैं, की स्मृति में निर्मित किया जाता है। इसमें धम्म चक्र का अंकन अनिवार्यतः होता है। यह स्तूप सारनाथ में है। भोट भाषा में इसे ताशी गोमांग छोटेन (Tashi Gomang Choten) कहा जाता है।

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4. अष्टप्रतिहार्य स्तूप

एकबार भगवान ने श्रावस्ती में आठ प्रतिहार्य अर्थात चमत्कार दिखाए थे। उस घटना की स्मृति में ‘अष्टप्रतिहार्य स्तूप’ निर्मित किये जाते हैं। इसमें अष्टमंगल का चित्रण होता है। यह स्तूप श्रावस्ती में निर्मित होता है। भोट भाषा में इसे चोटुल छोटेन (Chotul Choten) कहते हैं।

5. देवलोक अवतरण स्तूप

भगवान के 45 वर्षावासों में दो वर्षावास बड़े रहस्यमय हैं, जिनका विवरण भगवान की वाणी में ही मिल पाता है। एक वर्षावास भगवान ने कौशाम्बी के जंगलों में हाथी, बन्दर, तोता इत्यादि पशु-पक्षियों के साथ किया था और दूसरा देवलोक में अथवा तुषितलोक में। वहाँ अपनी माता महामाया को अभिधम्म की देशना देकर उन्हें धम्म में प्रतिष्ठित किया था। देवलोक में वर्षावास पूरा करने के उपरान्त उन्होंने संकिसा में अवतरण किया था। इसलिए संकिसा में ‘देवलोक अवतरण स्तूप’ निर्मित किया जाता है। भोट भाषा में इसे ल्हबाब छोटेन (Lhabab Choten) कहते हैं।

6. मैत्री स्तूप

भगवान ने धम्म की अभिवृद्धि के सात नियमों का उपदेश राजगृह, वर्तमान की राजगीर, में किया था। राजगीर में राजा बिम्बिसार की भगवान से प्रबल मैत्री थी। उन्होंने ही भगवान को पहला विहार दान किया था, बांसों का उपवन वेणुवन। वह मैत्री की स्मृति में निर्मित स्तूप को ‘मैत्री स्तूप’ कहते हैं। इस स्तूप में सतिया अर्थात स्वास्तिक के चिन्ह अंकित होते हैं। आपस में एक दूसरे से जुड़े हुए स्वास्तिक चिन्हों को श्रीवत्स या नन्दावर्त कहते हैं जो कि अटूट मैत्री, मंगलमैत्री का प्रतीक होता है। भोट भाषा में इसे इन्दुम छोटेन (Andum Choten) कहते हैं। यह स्तूप राजगृह में निर्मित किया जाता है।

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7. विजय स्तूप

स्तूप को स्मारक या मेमोरियल भी कहा जा सकता है। जरूरी नहीं है कि स्तूप में भगवान की पावन धातुएँ ही हों बल्कि किसी घटना विशेष की स्मृति स्वरूप भी स्तूप निर्मित किये जाते हैं।

भगवान ने कौशाम्बी के जंगलों में एक वर्षावास किया था और पशु-पक्षियों को सांकेतिक भाषा में उपदेश किया था। मुँह पर हाथ रखा बन्दर संकेत है कि बुरा मत बोलो। कान पर हाथ रखे हुए बन्दर का संकेत कि बुरा मत सुनो। आंख पर हाथ रखे हुए बन्दर का संकेत कि बुरा मत देखो। इन सांकेतिक उपदेशों ने ही चित्रात्मक यात्रा करते हुए भारत से चीन, वियतनाम होते हुए जापान के बुद्ध विहारों में जगह पायी। तीन बन्दरों की मूर्तियों से गांधीजी बेहद प्रभावित हुए। वे इन मूर्तियों को जापान से लाए और वे गाँधी जी के तीन बन्दरों के रूप में लोकप्रिय हो गये।

भगवान के सांकेतिक उपदेशों से पशु-पक्षियों ने तिर्यक योनि से मुक्त होने में विजय पायी। यह एक सम्भावित घटना है कि जिसकी स्मृति में ‘विजय स्तूप’ निर्मित किया जाता है। यह स्तूप कौशाम्बी में निर्मित किया जाता है। भोट भाषा में इसे नामग्याल छोटेन (Namgyal Choten) कहते हैं।

8. निब्बान स्तूप

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि यह स्तूप भगवान की महापरिनिर्वाण की स्मृति में निर्मित किया जाता है। निब्बान स्तूप कुशीनगर में निर्मित किया जाता है। भोट भाषा में इसे न्यंगदे छोटेन (Nyangday Choten) कहते हैं।

स्तूप की आकृति में सम्पूर्ण धम्म समावेशित होता है।

(लद्दाखी बुद्ध धम्म की काग्यु परम्परा के पूज्य लामा गेल्तसेन ने अनुगृहपूर्वक स्तूप के सम्बन्ध में भोट भाषा के शब्दार्थ बताए हैं।)

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