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गणेश शंकर विद्यार्थी एक ऐसे पत्रकार जो निकले तो थे दंगे रोकने लेकिन उन्हीं दंगो ने उनकी जान ले ली!

गणेश शंकर विद्यार्थी एक ऐसे पत्रकार जो निकले तो थे दंगे रोकने लेकिन उन्हीं दंगो ने उनकी जान ले ली!
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आज हिंदी पत्रकारिता के पितामह गणेश शंकर विद्यार्थी की जयंती है। गणेश शंकर विद्यार्थी 26 अक्टूबर 1890 को जन्मे और 25 मार्च 1931 को मार दिए गए थे।

आजादी की शुरुआती लड़ाई में हिंदू और मुसलमान दोनों ही साथ थे। पर अंग्रेजों ने भावनाओं से खेलना शुरू किया धार्मिक भावनाएं भड़काईं। और वो सब होने लगा जो नहीं होना चाहिए था। बंगाल विभाजन के रूप में इसका पहला धमाका देखने को मिला।

ये 1920 आते-आते बहुत बढ़ गया था। दंगे होने लगे थे। देश भर में सांप्रदायिक हिंसा फैलने लगी। इस हंगामें से एक पत्रकार बेहद परेशान था। जो ये सब बर्दाश्त नहीं कर पाया। और वो पत्रकार अमन का परचम थामकर दंगीली गलियों से गुजरने लगा। ये पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी थे।

पत्रकारिता के ‘प्रताप’, गांधी के अनुयायी

आज के समय में जब मीडिया के बड़े हिस्से पर ‘गोदी मीडिया’ बन जाने के आरोप लग रहे हैं, तब विद्यार्थी जी को याद करना, उनकी पत्रकारिता के ‘प्रताप’ को याद करना, जनता के प्यारे अखबार ‘प्रताप’ की लोकप्रियता, उसके सिद्धान्तों, मूल्यों और पत्रकारिता के उस मील के पत्थर को याद करना, जरूरी हो जाता है।

वह मूर्धन्य पत्रकार थे, वह क्रांतिकारी थे। वह हिंदी जाति के ज्ञानोदय के प्रतीक और हिंदी पत्रकारिता के पितामह कहे जाते रहेंगे।

वह एक जीताजागता पत्रकारिता और साहित्य का संस्थान थे, जहां से रामवृक्ष बेनीपुरी, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा जैसे साहित्यकारों का विकास हुआ तो वहीं भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों की पत्रकारीय प्रतिभा का भी विकास हुआ।

वह जितने पत्रकार थे उतने ही बड़े क्रांतिकारी थे। वह किसान आंदोलनकारी थे। वह मजदूरों के नेता थे। वह मूकजन की आवाज़ थे।

वह गांधी के अनुयायी थे, तो वहीं क्रांतिकारियों के सबसे विश्वसनीय साथी थे। उनका ‘प्रताप’ अखबार क्रांतिकारियों का अड्डा था, जहं भेष बदलकर भगत सिंह, आजाद सहित तमाम क्रांतिकारी महीनों रहते थे।

वहीं वह कांग्रेस के बड़े नेता थे जो यूनाइटेड प्रोविंस (आज का उत्तर प्रदेश) के कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भी थे। रायबरेली में किसान आंदोलन पर जमींदारों -अंग्रेजों ने जब गोली चलवायी, तो वह वहां सबसे पहले पहुंचे, किसानों को संगठित किया, आवाज उठायी और ‘प्रताप’ में लेख लिखा- ‘डायरशाही ओ डायरशाही’, यह दूसरा जलियांवाला कांड है।

जमीन पर गिरा लहू इस देश में सामंतशाही और साम्राज्यवाद दोनों की समाधि बनेगा। अंग्रेजों ने उन पर मुकदमा कर दिया। उनके पक्ष में 50 से ज्यादा गवाह पेश हुये जिसमें मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, श्री कृष्ण मेहता जैसे राष्ट्रीय नेता भी थे।

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दंगे रोकते-रोकते जान गवा बैठे गणेश शंकर-

1931 का वक्त था, सारे कानपुर में दंगे हो रहे थे। मजहब पर लड़ने वालों के खिलाफ जिंदगी भर गणेश शंकर विद्यार्थी लड़ते रहे थे, वही मार-काट उनके आस-पास हो रही थी।

लोग मजहब के नाम पर एक-दूसरे को मार रहे थे। ऐसे मौके पर गणेश शंकर विद्यार्थी से रहा न गया और वो निकल पड़े दंगे रोकने। कई जगह पर तो वो कामयाब रहे पर कुछ देर में ही वो दंगाइयों की एक टुकड़ी में फंस गए।

ये दंगाई उन्हें पहचानते नहीं थे। इसके बाद विद्यार्थी जी की बहुत खोज हुई, पर वो मिले नहीं। आखिर में उनकी लाश एक अस्पताल की लाशों के ढेर में पड़ी हुई मिली। लाश इतनी फूल गई थी कि उसको लोग पहचान भी नहीं पा रहे थे।

29 मार्च को उनको अंतिम विदाई दी गई। उनकी इस तरह हुई मौत इस बात की गवाही देती है कि गणेश शंकर विद्यार्थी जितना अपनी कलम से एक्टिव थे उतना ही वो रियल लाइफ में भी एक्टिव थे।

गांधी के बाद कोई मजहब के नाम पर लड़ना रोक सकता है तो वो है मोहानी-

हसरत मोहानी को तो जानते ही होंगे आप, वही जिन्होंने गजल लिखी है, चुपके-चुपके रात-दिन आंसू बहाना याद है… गणेश शंकर विद्यार्थी और उन्नाव के हसरत मोहानी साहब बहुत अच्छे दोस्त थे।

हरसत मोहानी की 1924 में जब जेल से वापसी हुई तो गणेश शंकर विद्यार्थी ने उनकी तारीफ में प्रताप में एक लेख लिखा था। जिसमें उन्होंने लिखा था कि मौलाना को मजहब के नाम पर झगड़ने वालों को रोकना चाहिए। और मोहानी ही हैं जो गांधी जी के बाद लोगों को मजहब के नाम पर एक-दूसरे को मारने से बचा सकते हैं।

जीवन की प्रेरणा थे गाँधी-

16 साल की उम्र में ही अपनी पहली किताब महात्मा गांधी से इंस्पायर होकर लिख डाली थी। किताब का नाम था हमारी आत्मोसर्गता। 1911 में ही उनका एक लेख हंस में छप चुका था। लेख का शीर्षक भी आत्मोत्सर्ग था।

प्रताप अखबार की शुरुआत विद्यार्थी जी ने 9 नवंबर, 1913 में की थी। विद्यार्थी जी के जेल जाने के बाद प्रताप का संपादन माखनलाल चतुर्वेदी और बालकृष्ण शर्मा नवीन जैसे बड़े साहित्यकार करते रहे।

‘झंडा ऊंचा रहे हमारा’ गीत जो श्याम लाल गुप्त पार्षद ने लिखा था। उसे भी 13 अप्रैल 1924 से जलियांवाला की बरसी पर विद्यार्थी ने गाया जाना शुरू करवाया था।

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मानहानि के केस में 7 महीने तक जेल में रहे-

गणेश शंकर विद्यार्थी वैसे तो अपनी पूरी जिंदगी में 5 बार जेल गए। आखिरी बार वो 1921 में जेल गए थे। विद्यार्थी जी ने जनवरी, 1921 में अपने अखबार में एक रिपोर्ट छापी थी। रायबरेली के एक ताल्लुकदार सरदार वीरपाल सिंह के खिलाफ।

वीरपाल ने किसानों पर गोली चलावाई थी और उसका पूरा ब्यौरा प्रताप में छापा गया था। इसलिए प्रताप के संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी और छापने वाले शिवनारायण मिश्र पर मानहानि का मुकदमा हो गया। ये मुकदमा लड़ने में उनके 30 हजार रुपये खर्च हो गए।

पर प्रताप इस केस से फेमस हो गया। खासकर किसानों के बीच। विद्यार्थी जी को भी सब लोग पहचानने लगे। उनको लोग प्रताप बाबा कहते थे। इसी दौरान उन पर केस चला, गवाही हुई। गवाह के रूप में इस केस में मोतीलाल नेहरू और जवाहर लाल नेहरू भी पेश हुए थे।

और सारी गवाही होने के बाद, फैसला ताल्लुकदार के फेवर में गया। दोनों लोगों पर दो-दो केस थे। और दोनों लोगों को 3-3 महीने की कैद और पांच-पांच सौ रुपये का जुर्माना हुआ।

अंग्रेजों को भी प्रताप से प्रॉब्लम थी। इसलिए ये सही मौका था कि वो प्रताप को लपेटे में लेते। तो उन्होंने ले भी लिया। ए़डिटर और छापने वाले दोनों से पांच-पांच हजार का मुचलका और 10-10 हजार की जमानतें मांगीं।

मुकदमे के दौरान ये उनको करना ही पड़ा, वरना गोलीकांड का पूरा खुलासा न हो पाता। पर जब फैसला हो गया। तो विद्यार्थी जेल चले गए। छपाई वाले मिश्रजी नहीं गए क्योंकि उनको दिल की बीमारी थी।

उधर रायबरेली केस की अपील भी कर दी गई थी। जो विद्यार्थी की जेल-यात्रा के दौरान ही 4 फरवरी, 1922 को खारिज भी हो गई।

7 महीने से ज्यादा विद्यार्थी जेल में रहे। इस दौरान उन्हें लिखने के लिए एक डायरी मिली थी।  इसमें जनवरी के लास्ट से लेकर मिड मई तक की इंट्री है। 22 मई को जब जेल से निकले तो उनको डायरी के बेस पर ही उन्होंने अपनी जेल यात्रा का सारा किस्सा लिखा। जेल जीवन की झलक नाम से सीरीज छपी और बहुत हिट रही।

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